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जानिए मुंगेर की दुर्गा पूजा अपने आप ऐसा क्या विशेष महत्त्व रखती है !


मुंगेर की दुर्गा पूजा जिले में उत्साह,आध्यात्मिकता और गर्व के साथ मनाई जाती है। यह हिंदू धर्म के सबसे शुभ दिनों को दर्शाता है।

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आश्विन माह के चढ़ते चन्द्रमा के छठी तिथि से मनाये जाने वाले दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल, बिहार, असम के साथ-साथ पूरे भारत में व्यापक रूप में मनाया जाता है। 91% हिन्दू राष्ट्र वाले देश नेपाल के साथ-ही-साथ 8% हिन्दू आबादी वाले देश बांग्लादेश भी दुर्गा पूजा हर्षोउल्लास से मनाते है। बिहार में इसे दशहरा, नवरात्री, महल्या आदि नामो से भी जाना जाता है। वैसे तो बिहार के विभिन्न जिलों में इस पर्व की मान्यतायें भिन्न-भिन्न है।


मुंगेर जो बिहार की राजधानी से लगभग 150 किमी. दक्षिण में गंगा के तट पर बसा है, यहाँ इस पर्व को लेकर एक अलग ही मान्यता है।जहाँ एक ओर यह पर्व 10 दिनों तक चलता है कहीं-कहीं तो सिर्फ विजयदशमी का ही आयोजन होता है वही भारत में शायद ही कोई ऐसा स्थान हो जहाँ यह पर्व 12 दिनों तक चलता है।बंगाल और असम में मेला का आयोजन छठी पूजा से होता है पर मुंगेर में तो पहली पूजा से ही मेला का दृश्य देखने को मिल जाता है।



पूजा के कुछ दिन पहले से ही बाजारों में भीड़-भाड़ से भरी सड़के, रंग-बिरंगे खिलौनों से सजी दुकाने, चाट पकौड़ो से भरी दुकानों का दृश्य देखने लायक होता है।मुंगेर में छोटे-बड़े मंदिरों को मिला कर लगभग 100 प्रतिमायें स्थापित की जाती है।सभी पूजा समिति का अपना मंदिर है। कुछ बड़े-बड़े पंडाल भी बनाये जाते है

मधोपुर दुर्गा पूजा समिति

दुर्गा पूजा समिति
सभी मंदिरों की एक पूजा समिति होती है और ये सभी समिति जिला प्रशासन के द्वारा पंजीकृत की जाती है। इससे दुर्गा पूजा के दौरान बेहतर माहौल और सुरक्षा में मदद मिलता है। पूजा समितियों को उनकी पहचान और विसर्जन के लिए एक नंबर आवंटित किए जाते हैं ।इस नंबर की श्रृंखला में, शादीपुर की बड़ी दुर्गा माता सभी पूजा समितियों के बीच में पहली स्थान रखती है।


दुर्गा पूजा का तीसरा दिन
दुर्गा पूजा का तीसरा दिन और प्रभावी रूप से यह चौथा दिन होता है। जब हम महल्या’ की गणना करते हैं; जो इस उत्सव का हिस्सा है। तीसरा दिन “माँ चंद्रघंटा” को समर्पित है । सुंदरता और बहादुरी का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व देवी दुर्गा की तीसरी अभिव्यक्ति है, इस दिन उनकी पूजा इसी रूप में की जाती है।

छठी पूजा के दिन बड़ी दुर्गा माँ का रूप

छठी और सप्तमी पूजा
छह पूजा की शाम तक, माँ की प्रतिमायें पूरी मिट्टी की दिखती है। हालांकि माता की अनुष्ठान पहले दिन से ही एक प्रवाह के साथ किया जाता है। कलाकार देवी माता को अंतिम स्पर्श उसी दिन की मध्यरात्रि तक देते है ।अगले दिन महासप्तमी होता है, नवरात्रि का सातवां दिन देवी सरस्वती को समर्पित है। आधी रात के बाद निशा पूजा होती है, जो मुंगेर की दुर्गा पूजा के बीच बहुत प्रसिद्ध है। उस दिन माँ दुर्गा की स्वागत करने के लिए घी से भरे 101 दीप जलाए जाते हैं। इसी दिन देवी कात्यायनी की भी पूजा की जाती है।

निशा पूजा

महाअष्टमी
महाअष्टमी, दुर्गा पुजा का आठवां दिन,आज के दिन देवी “महागौरी” के रूप में प्रकट होती हैं। माना जाता है कि माता सीता ने श्री राम की प्राप्ति के लिए महागौरी की पूजा की थी। अष्टमी के दिन माँ को नारियल का भोग लगाया जाता है।


महानवमी
दुर्गा पूजा के नौवें दिन देवी दुर्गा, नवदुर्गा की नौवीं अभिव्यक्ति “सिद्धिदात्री ‘के रूप में होती हैं। जैसा कि परंपरा है, प्रत्येक वर्ष मुंगेर के लोग नौवें दिन कुमारी कन्याओं को भोजन कराते हैं और उनकी पूजा भी करते है ।

शक्तिपीठ चंडिका स्थान
गंगा के तट पर शक्ति पीठ माँ चंडिका स्थान स्थित है , लोगो का ऐसा मानना है की दुर्गा पूजा के दौरान माता चण्डी की पूजा करने का एक अलग ही महत्व है। भक्तजनों की भीड़ पहली पूजा के दिन से ही शुरु हो जाती है। नमवी पूजा, जिस दिन माता चंडी को आखरी दिन जल चढ़ाया जाता है उस दिन तो मंदिर के बाहर रात 12 बजे से ही लोग कतार में लग जाते है। उस दिन लोग वहां हवन भी करते है।

शक्तिपीठ चंडिका स्थान

इस प्रकार पहली पूजा से ले कर नवमी पूजा तक माँ के नौ रूपों की परंपरागत पूजा की जाती है।नवमी के अगले ही दिन विजय दशमी का उत्सव मनाया जाता है।

विजयदशमी और दशहरा
यह दिन विष्णु के सातवें अवतार – भगवान राम की जीत का प्रतीक है जब उन्होंने दस सिर वाले राक्षस रावण का वध किया था। दूसरी तरफ भैंस दानव महिषासुर पर देवी दुर्गा की जीत को याद कराती है।

रावण वध पोलो मैदान से

पोलो मैदान में रावण वध का आयोज़न होता है रावण वध को देखने के लिए मुंगेर की लगभग आधी जनता पोलो मैदान के तरफ निकल पड़ती है और उसी शाम दूसरी ओर शादीपुर में अपार शक्ति की देवी बड़ी दुर्गा माता ” शोभा यात्रा ” नामक एक अनोखे अनुष्ठान के लिए तैयार हो जाती हैं। “शादीपुर की बड़ी दुर्गा की शोभा यात्रा” पूरे देश में मुंगेर की दुर्गा पूजा के महत्व को दर्शाती है।



मुंगेर की दुर्गा पूजा की बात करें और शादीपुर का जिक्र न हो ऐसा संभव ही नहीं है।वैसे तो यह क्षेत्र संकरी गलियों से जुड़ा है पर दुर्गा पूजा के दौरान यही शहर के मुख्य आकर्षण का केंद्र बना होता है।यहाँ पर लगभग 8 से 10 प्रतिमायें विराजती है।मुंगेर की बड़ी दुर्गा जो की लगभग 400 वर्ष पुरानी है।बड़ी दुर्गा से थोड़ी ही दूरी पर छोटी दुर्गा, बड़ी काली तथा छोटी काली की भी प्रतिमायें विराजती है।इन सभी को बड़ी दुर्गा का ही एक परिवार माना जाता है।बड़ी दुर्गा माँ को अपार शक्ति की देवी भी बोला जाता है।

बड़ी दुर्गा शादीपुर
बड़ी दुर्गा शादीपुर

मान्यता है की माँ की शक्ति अटूट है, माँ निराली है, माँ की ममता अपरम्पार है।माँ की मूर्ति सदियों से एक जैसी ही दिखती आ रही है । पिछले चार सौ वर्षो में मूर्तिकार तो कई आये और गए परन्तु बड़ी माँ की बनावट में एक तिनका भर भी बदलाव नहीं हुआ। माँ की महिमा इतनी अपरंपार है की दूर-दूर से आये भक्त भी माँ की एक झलक के लिये बेताब रहते है।माँ की प्रतिमा इतनी शालीनता से बनाई जाती है की ऐसा प्रतीत होता है की माँ अभी बोल पड़ेगी।माँ की आँखे इतनी आकर्षक है की मंदिर से हटने का जरा भी मन नहीं करता है।



“बड़े बुजुर्गो का ऐसा कहना है की एक बार मुंगेर में कार्फियु लगा हुआ था, तब मुंगेर प्रसाशन ने बड़ी माँ की विसर्जन ट्रक पर करने की सोची।वे प्रतिमा को उठाने के लिए गए परन्तु प्रतिमा टस-से-मस नहीं हुआ तत्पश्चात 32 कहारों को बुलाया गया और परम्परगत विसर्जन किया गया।”

शोभा यात्रा की एक जलक

विसर्जन
बड़ी दुर्गा माता की ” शोभा यात्रा ” विजयदशमी के शाम से ही शुरु हो जाती है। शोभा यात्रा विसर्जन का भव्य रूप है जो की पूरे देश में मुंगेर की दुर्गा पूजा के महत्व को दर्शाती है। पूरी रात शोभा यात्रा मुंगेर की सड़कों से होकर गुजरती है। रात्रि के 12 बजे कौड़ा मैदान में बड़ी माँ का मिलन छोटी माँ से तथा बड़ी काली का मिलन छोटी काली के साथ होता है। इस समय का दृश्य सभी दर्शको को भावुक कर देता है। फिर यह शोभायात्रा बड़ी बाज़ार के रास्ते बाटा चौक पर सुबहे चार बजे पहुँचती है जहाँ श्रद्धासमर्पण समिति द्वारा माँ की भव्य आरती की जाती है।

श्रद्धासमर्पण समिति द्वारा माँ की भव्य आरती

उसके बाद यह शोभा यात्रा एक नंबर ट्रैफिक पर पहुंचती है। जहाँ आखाडा में निपुण कर्तव्यबाज़ों द्वारा बहुत ही अद्भुत कर्तव्य दिखाया जाता है।ततपश्चात शहर की सभी प्रतिमायें यही से कतारबद्ध हो जाती है फिर बड़ी महावीर मंदिर में आरती के पश्चात भगत सिंह चौक के रास्ते सोझी घाट के लिये निकल पड़ती है।भगत सिंह चौक के बाद बड़ी माँ की प्रतिमा का मुख पूरब की ओर कर दिया जाता है जिससे माँ जाते हुए अपने भक्त को देख सके।

पंक्तिबद्ध प्रतिमायें

अब छोटी दुर्गा, बड़ी काली, छोटी काली, दुर्गा नं 4 पंक्तिबद्ध महावीर मंदिर के पास आरती के लिए लायी जाती है।जैसे-जैसे गंगा घाट नजदीक आता है वैसे-वैसे ढोल बाजों के आवाज़ के बावजूद मुंगेर के लोगो के ह्रदय में सन्नाटा छा रहा होता है । गंगा घाट पहुचने के पश्चात माँ की आराधना की जाती है फिर माँ की प्रतिमा का गंगा में विसर्जन कर दिया जाता है।




अगले दिन अर्थात द्वादशा का वक़्त होता है, जमालपुर की प्रतिमा मुंगेर आते आते सुबहे हो जाती है चूँकि ये प्रतिमायें शहर से 10-12 कि.मी.की दूरी से आती है । लोगो को इसका बेसब्री से इंतज़ार होता है। यहां के प्रतिमा की सजावट का एक अलग ही विशेषता है।इसमें देश के राजनितिक माहौल को व्यंग चित्रों के द्वारा दर्शाया होता है जो लोगो को बहुत आकर्षित करता है।

जमालपुर दुर्गा विसर्जन

जमालपुर की प्रतिमा के विसर्जन के बाद पूरे शहर का वातावरण शांत हो जाता है।ऐसा लगता है की शहर में एक अजीब किस्म का सन्नाटा छा गया है और साथ-ही-साथ यह 12 -13 दिनों का मेला हमारे लिए पूरे साल भर के लिये एक याद बन कर रह जाता है। और फिर हमे इंतज़ार होता है तो बस अगले साल की दुर्गा पूजा का।


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Incredible Munger Bihar

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